
इंडिया रिपोर्टर लाइव
नई दिल्ली/रांची 27 दिसंबर 2025। खनन, सड़क-रेल परियोजनाओं, बिजली लाइनों और जंगलों के तेजी से खंडित होते भूगोल के बीच झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष अब केवल वन्यजीव संरक्षण का नहीं, बल्कि सामाजिक, पारिस्थितिक और मानवीय संकट का रूप ले चुका है। राज्य के कोल्हान और सारंडा अंचल से लेकर रांची, पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला तक हाथियों की तड़प-तड़प कर हो रही मौतें यह सवाल खड़ा कर रही हैं कि क्या विकास की दौड़ में झारखंड अपने राजकीय पशु को खोने की कगार पर खड़ा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान और भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की प्रोजेक्ट एलीफेंट के अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2000 से 2023 के बीच झारखंड में कुल 225 हाथियों की मौत दर्ज की गई। इनमें 152 मौतें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मानव-जनित कारणों से हुईं, जबकि 73 मौतें प्राकृतिक कारणों से बताई गईं। इसी अवधि में हाथियों के हमलों में 1,340 लोगों की जान गई और लगभग 400 लोग घायल हुए। यह स्पष्ट करता है कि यह संघर्ष केवल वन्यजीवों तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी समाज के लिए भी गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती बन चुका है।
विस्फोट, करंट और ट्रेनें मौत के नए चेहरे
हालिया महीनों में हाथियों की एक के बाद एक मौत ने सबको झकझोर दिया। सारंडा के जंगलों में माओवादियों की बिछाई आईईडी विस्फोट से तीन हाथियों की मौत हुई। इसके अलावा 23 वर्षों में 67 हाथियों की मौत बिजली के झटके से, 17 की ट्रेन दुर्घटनाओं में, 11 की जहर से, 4 की शिकार से, 1 की लैंडमाइन विस्फोट से और कई की अन्य आकस्मिक कारणों से हुई।
एक साल में कई जानें गईं
नवंबर 2023 में सिंहभूम के मुसाबनी के बेनियासाई गांव में बिजली के करंट से पांच हाथियों की मौत हो गई थी, जिनमें दो बच्चे थे। वर्ष 2024-25 में 15 हाथियों की मौत दर्ज की गई, जबकि वर्ष 2025 में अब तक कम से कम 16 हाथियों की मौत हो चुकी है। दूसरी ओर, 2021 से मार्च 2025 के बीच हाथियों के हमलों में 397 लोगों की जान गई है। यह संतुलन के पूरी तरह बिगड़ जाने का संकेत है।


