
इंडिया रिपोर्टर लाइव
नई दिल्ली 12 दिसंबर 2025। जनता का विश्वास हमेशा से भारत के परमाणु कार्यक्रम की आधारशिला रहा है। देश के सतत, समतापूर्ण और ऊर्जा-सुरक्षित विकास के दृष्टिकोण में यह आधार निहित है कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग अत्यधिक संरक्षा, निर्विवाद उत्तरदायित्व और पारदर्शी संचार के साथ किया जाए। जैसे-जैसे हम परमाणु ऊर्जा के लिए एक नए विधायी ढांचे पर विचार कर रहे हैं, यह पूछना जरूरी है कि यह नए अधिनियम से क्या हासिल होगा? मेरे विचार से इसका उत्तर इन्हीं आधारों को मजबूत करने में निहित है। नए अधिनियम को यह गारंटी देनी चाहिए कि संरक्षा-संस्कृति जारी रहे। इसे उच्चतम संरक्षा मानकों के प्रति भारत की अटूट प्रतिबद्धता की पुष्टि करनी चाहिए और नियामक संस्थानों की स्वायत्तता, अधिकार और जवाबदेही को मजबूत करना चाहिए। इसे आवश्यकतानुसार प्रौद्योगिकी उन्नयन और पारदर्शी संरक्षा समीक्षाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसे प्रचालन प्रदर्शन पर सूचना के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा देना चाहिए।
दायित्व-स्पष्टता के साथ उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना
नाभिकीय क्षति के लिए असैन्य दायित्व अधिनियम (सीएलएनडी अधिनियम) एक अग्रणी कदम रहा है जिसने तीन महत्वपूर्ण हितों को संतुलित किया है: जनता की संरक्षा, आपूर्तिकर्ताओं को आश्वासन और ऑपरेटरों का विश्वास। इसने दोष-रहित दायित्व सिद्धांत को प्रतिपादित किया और यह सुनिश्चित किया कि ऑपरेटर की जिम्मेदारी स्पष्ट और निर्देशित रहे। नए अधिनियम को सुनिश्चित करना चाहिए कि शासन का फ्रेमवर्क निष्पक्ष, स्पष्ट हो और संदेह रहित बना रहे, साथ ही जवाबदेही की एक सुपरिभाषित शृंखला भी बनाए रखे। इसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि दायित्व का मूल्यांकन करने की व्यवस्था देश में परमाणु तैनाती की सीमा और पैमाने के अनुरूप हो।
जन विश्वास-प्रगति की आधारशिला
दुनिया भर में परमाणु उद्योग के उत्कृष्ट संरक्षा रिकॉर्ड के बावजूद परमाणु ऊर्जा के प्रति जनता का दृष्टिकोण अक्सर वैज्ञानिक तथ्यों की तुलना में धारणाओं से अधिक प्रभावित होता रहा है। जनता का विश्वास केवल पारदर्शिता और जनता के साथ संवाद के माध्यम से ही अर्जित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, जब नागरिक देखते हैं कि परमाणु विज्ञान रेडियोथेरेपी के माध्यम से जीवन बचा रहा है, उत्परिवर्तन प्रजनन के माध्यम से फसलों को बढ़ा रहा है या विकिरण शुद्धिकरण के माध्यम से सुरक्षित जल उपलब्ध करा रहा है, तो वे परमाणु ऊर्जा के मानवीय पहलू से जुड़ने लगते हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग में अपने कार्यकाल के दौरान, हमने नई आउटरीच रणनीतियों की शुरुआत करके इस दिशा में कई प्रयास किए, जिसके परिणामस्वरूप 2015 की गणतंत्र दिवस परेड में परमाणु ऊर्जा विभाग की झांकी प्रदर्शित की गई।
नए अधिनियम में क्या गारंटी होनी चाहिए
यदि 1962 के प्रथम परमाणु ऊर्जा अधिनियम ने क्षमता निर्माण के मूल मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया था, तो नए अधिनियम का उद्देश्य आत्मविश्वास बढ़ाना और परमाणु प्रौद्योगिकी की बड़े पैमाने पर तैनाती करना होना चाहिए। इसमें उस राष्ट्र की परिपक्वता प्रतिबिंबित होनी चाहिए जिसने जटिल तकनीकों में महारत हासिल की है और जिम्मेदार आचरण के माध्यम से वैश्विक सम्मान अर्जित किया है।
विकसित भारत की ओर बढ़ते कदम
भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिए यह एक परिवर्तन का दौर है। बड़े विद्युत संयंत्रों के अलावा, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर और प्रगत थोरियम प्रणालियां परमाणु ऊर्जा की पहुंच का विस्तार करेंगी। इसलिए नए अधिनियम को एक ऐसे फ्रेमवर्क की गारंटी देनी चाहिए जो प्रौद्योगिकियों के तेज उपयोग को सुगम बनाए और साथ ही स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास तथा विनिर्माण को प्रोत्साहित करे।


