US से जंग के बीच ईरान में बड़ा बदलाव: सरकार के बदले IRGC कर रही फैसले, खबर में दावा- कमांडर वाहिद को मिली कमान

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तेहरान 20 अप्रैल 2026। ईरान को लेकर आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब वहां की सेना और विदेश नीति पर कट्टरपंथी संगठन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) का पूरा नियंत्रण हो गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आईआरजीसी के कमांडर अहमद वाहिदी और उनके सहयोगी अब देश के फैसले ले रहे हैं, जबकि पहले जो नेता बातचीत और शांति की कोशिश कर रहे थे, उन्हें किनारे कर दिया गया है।

अराघची के फैसले को IRGC ने मानने से किया इनकार
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची अमेरिका के साथ बातचीत कर हालात सामान्य करना चाहते थे। यहां तक कि उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने पर भी सहमति जताई थी, जो दुनिया के लिए बेहद अहम तेल मार्ग है। लेकिन आईआरजीसी ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया और साफ कर दिया कि यह रास्ता बंद ही रहेगा।

होर्मुज में जहाजों पर की गई फायरिंग, बढ़ा तनाव
स्थिति उस समय और तनावपूर्ण हो गई जब ईरान ने इस जलमार्ग से गुजरने की कोशिश कर रहे कई जहाजों को निशाना बनाया। इससे फारस की खाड़ी में सैकड़ों जहाज फंस गए और वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई। यह कदम आईआरजीसी की ताकत और उसके सख्त रुख को दिखाता है।

अहमद वहीदी को प्रभावशाली नेताओं का समर्थन
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि आईआरजीसी के भीतर अहमद वहीदी को मोहम्मद बगेर जोलगाद्र जैसे प्रभावशाली नेताओं का समर्थन मिल गया है, जिससे उनकी पकड़ और मजबूत हो गई है। इन नेताओं का असर अब सिर्फ सेना तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सीधे कूटनीतिक फैसलों में भी दखल दे रहे हैं।

अराघची पर ज्यादा नरम रुख अपनाने का आरोप
इसके अलावा, ईरान की बातचीत टीम के अंदर भी मतभेद सामने आए हैं। बताया गया है कि कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि विदेश मंत्री ने अपनी सीमा से ज्यादा जाकर नरम रुख अपनाया, जिसके बाद पूरी टीम को वापस तेहरान बुला लिया गया। इससे साफ है कि अब देश के अंदर सख्ती बढ़ रही है और अलग राय रखने वालों के लिए जगह कम होती जा रही है।

शांति वार्ता पर पड़ेगा नेतृत्व परिवर्तन का असर?
इस पूरे घटनाक्रम का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिख रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की संभावनाएं काफी कमजोर हो गई हैं, क्योंकि जिन नेताओं के पास बातचीत की जिम्मेदारी है, उनके पास अब फैसला लेने की ताकत ही नहीं बची है। फिलहाल, हालात काफी नाजुक बने हुए हैं। संघर्षविराम कब तक चलेगा, इस पर भी अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देशों के बीच तनाव कम होगा या हालात और बिगड़ेंगे।

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