618 साल पुरानी परंपरा के तहत दी गई 12 बकरों की बलि

इंडिया रिपोर्टर लाइव
जगदलपुर, 20 अक्टूबर 2026। प्रसिद्ध बस्तर दशहरे की महत्वपूर्ण रस्मों में शामिल निशा जात्रा विधान को शारदीय नवरात्र की महाष्टमी की देर रात पूरा किया गया। इस दौरान पूर्व राजपरिवार के सदस्यों ने 12 बकरों की बलि देकर करीब 618 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। बस्तर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने आधी रात मां खमेश्वरी की विशेष पूजा-अर्चना की। उन्होंने देवी से पूरे राज्य की सुख-समृद्धि, खुशहाली और बुरी प्रेत आत्माओं से रक्षा की कामना की। मान्यता के अनुसार बलि देने के बाद मिट्टी के 12 पात्रों में रक्त भरकर पूजा-अर्चना पूरी की गई।
618 साल पुरानी परंपरा
बस्तर के इतिहास में निशा जात्रा विधान का विशेष महत्व है। इस परंपरा की शुरुआत लगभग 618 वर्ष पूर्व हुई थी। प्राचीनकाल में राजा-महाराजा राज्य को बुरी शक्तियों से बचाने के लिए तंत्र विधियों से यह पूजा करवाते थे। पूर्व राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव के अनुसार महाष्टमी पर हवन पूरा होने के बाद देवी को प्रसन्न करने के लिए गुप्त रूप से यह पूजा होती थी। उस समय केवल राजवंश के लोग ही इसमें शामिल होते थे।
अब वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहते हैं। समय के साथ रस्म के स्वरूप में बदलाव आया है। पहले इस विधान में सैकड़ों भैंसों की बलि दी जाती थी, लेकिन अब 12 बकरों की बलि देकर रस्म निभाई जाती है।
12 गांवों के राउतों का विशेष योगदान
निशा जात्रा विधान में 12 गांवों के राउतों की भी अहम भूमिका होती है। मां खमेश्वरी के लिए भोग प्रसाद तैयार करने की जिम्मेदारी राजुर, नैनपुर और रायकोट के राउतों समेत परंपरा से जुड़े समुदाय के लोगों की होती है। ये लोग कई साल से माता को भोग अर्पित करते आ रहे हैं। वहीं राजपरिवार के सदस्य करीब एक घंटे तक पूजा-अर्चना करके विधान पूरा करते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस रस्म के जरिये देवी को प्रसन्न करके राज्य की बुरी शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना की जाती है।
मावली परघाव रस्म की तैयारियां और प्रक्रिया
निशा जात्रा के बाद अब बस्तर दशहरे की एक और महत्वपूर्ण रस्म मावली परघाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इसके लिए माता की डोली और छत्र जगदलपुर पहुंच गए हैं। आज शाम राजपरिवार के सदस्य माता की डोली और छत्र का स्वागत करेंगे। इस दौरान वे परंपरागत पूजा-अर्चना के साथ माता का सम्मानपूर्वक अभिनंदन करेंगे। माता की डोली और छत्र जिस रास्ते से लाएंगे, वहां भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने बैरिकेडिंग की है, ताकि आयोजन व्यवस्थित तरीके से संपन्न हो सके।
जोगी उठाई की रस्म भी होगी
मावली परघाव के दौरान सबसे पहले माता को सलामी दी जाएगी और उन्हें विराजमान कराया जाएगा। इसके बाद जिया बाबा के माध्यम से राजपरिवार को माता की डोली आने की सूचना मिलेगी। इस अवसर पर जोगी उठाई की रस्म भी होगी। बस्तर के देवी-देवताओं के देव विग्रहों के साथ राजपरिवार के सदस्य आयोजन स्थल पर पहुंचेंगे और माता का स्वागत करेंगे। इसके बाद वे खुद माता की डोली उठाकर राजमहल लाएंगे। डोली को दोबारा उठाने के साथ ही बस्तर दशहरे के समापन की प्रक्रिया पूरी होती है। इस आयोजन में दंतेवाड़ा से आए पुजारी, सेवादार और अन्य लोग शामिल होते हैं।
पंचमी का ऐतिहासिक निमंत्रण विधान
बस्तर दशहरे की परंपराओं में पंचमी का भी विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार माता ने महाराजा से पंचमी के दिन ही निमंत्रण देने की बात कही थी। इसी कारण इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। राजपरिवार के सदस्य माता के दरबार पहुंचकर दर्शन करते हैं और पूजा-अर्चना के बाद उन्हें राजमहल चलने का निमंत्रण देते हैं। कमलचंद्र भंजदेव के अनुसार मां दंतेश्वरी उनकी कुलदेवी हैं। बस्तर दशहरे में निभाई जाने वाली इन रस्मों का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है, जो बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती हैं।


