भारत से है खास रिश्ता

इंडिया रिपोर्टर लाइव
वाशिंगटन, 04 नवंबर 2026। डेमोक्रेट अब्दुल अल-सैयद ने मिशिगन में अमेरिकी सीनेट सीट की दौड़ में रिपब्लिकन माइक रोजर्स को हरा दिया है। यह जीत पूर्व जन स्वास्थ्य अधिकारी के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, जिन्होंने डॉक्टर के रूप में प्रशिक्षण लेने के बाद राजनीति में कदम रखा था।
अहम है यह जीत
इस जीत के साथ, अल-सैयद अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम बनकर इतिहास रच दिया है।अल-सैयद ने ‘यूनिवर्सल हेल्थकेयर’ (सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा) और सरकारी जवाबदेही पर केंद्रित एजेंडे के साथ चुनाव प्रचार किया था। उन्होंने देश के प्रमुख राजनीतिक अखाड़ों में से एक में हुए इस कड़े मुकाबले में जीत हासिल की है।
उनकी यह जीत अगस्त 2026 में हुए एक विवादास्पद डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनाव के बाद आई है, जिसमें उन्होंने सत्ताधारी वर्ग की समर्थक सांसद हेली स्टीवंस को मामूली अंतर से हराया था। मिशिगन में हुए इस चुनाव ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया था क्योंकि डेमोक्रेट सीनेट पर फिर से नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर रहे थे।
दूसरी बार मैदान में थे रोजर्स?
पूर्व कांग्रेस सदस्य और हाउस इंटेलिजेंस कमिटी के चेयरमैन रोजर्स, 2024 में डेमोक्रेट एलिसा स्लॉटकिन से 20,000 से भी कम वोटों से हारने के बाद, सीनेट की सीट जीतने की दूसरी कोशिश कर रहे थे।
अल-सैयद के लिए, यह जीत उस राजनीतिक सफर का पड़ाव है, जिसकी शुरुआत चिकित्सा के क्षेत्र में उनके करियर से हुई थी। उनकी चुनाव प्रचार वेबसाइट के अनुसार, उन्होंने शुरुआत में डॉक्टर बनने के लिए ट्रेनिंग ली थी, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि राजनीतिक व्यवस्था की कमियां ही लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रही हैं।
कौन हैं अब्दुल अल-सैयद?
उन्होंने अपना करियर पब्लिक हेल्थ और सरकारी प्रशासन के क्षेत्र में बनाया है। इसमें वेन काउंटी डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ, ह्यूमन एंड वेटरन्स सर्विसेज के डायरेक्टर के तौर पर काम करना भी शामिल है।
उनके चुनाव प्रचार का मुख्य जोर इस बात पर था कि हेल्थकेयर सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए, और सरकार को अमीर लोगों या बड़ी कंपनियों के बजाय आम अमेरिकी नागरिकों के लिए काम करना चाहिए।
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- दक्षिण-पूर्वी मिशिगन में जन्मे और पले-बढ़े अल-सैयद ने पब्लिक स्कूलों में पढ़ाई की और अपने हाई स्कूल की फुटबॉल, रेसलिंग और लैक्रोस टीमों के कप्तान रहे।
- उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से सर्वोच्च सम्मान के साथ स्नातक किया और वहां की पुरुष लैक्रोस टीम के लिए खेले। बाद में, उन्होंने ‘नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ’ द्वारा फंड की गई फेलोशिप के जरिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मेडिकल की डिग्री हासिल की, और रोड्स स्कॉलर के तौर पर यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड से दूसरी डॉक्टरेट पूरी की।
- उनके पिता, मोहम्मद, मिस्र से आकर बसे हैं, जबकि उनकी सौतेली मां, जैकी, एक ऐसे परिवार से हैं जो 1800 के दशक से मिशिगन की ग्रैटिओट काउंटी में रह रहा है।
- अल-सैयद, सारा और अपनी दो बेटियों, एमाली और सेरीन के साथ एन आर्बर में रहते हैं।
भारत से खास संबंध
अल-सैयद की जीत का तटीय कर्नाटक से एक निजी जुड़ाव भी है। यह जुड़ाव उनकी पत्नी डॉ. सारा जुकाकू के जरिए है, जो एक मनोचिकित्सक हैं। उनका परिवार भटकल से ताल्लुक रखता है, जो मंगलुरु से लगभग 140 किलोमीटर दूर है। सारा, जुकाकू शमसुद्दीन की पोती हैं। शमसुद्दीन ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बी.डी. जत्ती के नेतृत्व में मैसूर राज्य में वित्त उप-मंत्री के रूप में काम किया था।
जीत के बाद अल सैयद ने क्या कहा?
जीत के बाद अब्दुल अल-सैयद ने कहा, ‘मैं उसी खुले दिल, उदार सोच, दृढ़ संकल्प और सच्ची लगन के साथ आपकी सेवा करने के लिए उत्सुक हूं, जो आपने मुझे दिखाई है। मेरे सबसे कठिन समय में आपने मुझे सम्मान और ताकत दी। वह उम्मीद और प्रेरणा दी जिससे मुझे अपना सर्वश्रेष्ठ देने की शक्ति मिली। मुझे उम्मीद है कि आपकी सेवा के लिए मैं यही सब अपने साथ वाशिंगटन ले जा सकूंगा। पिछले एक महीने ने इस चुनाव के महत्व को और भी स्पष्ट कर दिया है। हमारा यह खूबसूरत आंदोलन पिछले डेढ़ साल में मिशिगन के बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक प्रचार करके खड़ा किया गया है। हमने एक बेहतर, बड़े और उम्मीदों से भरे मिशिगन की बात की है। वहीं दूसरी ओर, उनका अभियान पूरी तरह से बनावटी है। कॉर्पोरेट द्वारा फंड किया गया एक ऐसा विज्ञापन अभियान, जिसका मकसद लोगों को धोखा देना और उनका ध्यान भटकाना है।’

