
इंडिया रिपोर्टर लाइव
जम्मू-कश्मीर 20 जुलाई 2025। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरियों में आरक्षित वर्गों को 70 फीसदी तक आरक्षण देने के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सरकार से इस पर चार हफ्ते के भीतर जवाब तलब किया है। जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की पीठ ने आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पर यह आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह आरक्षण बिना किसी ठोस आधार या डेटा के दिया गया है, जबकि जिन वर्गों को 70 प्रतिशत आरक्षण मिला है, उनकी जनसंख्या करीब 30 प्रतिशत ही है। ऐसे में सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए सिर्फ 30 प्रतिशत पद ही बचते हैं। याचिका में जम्मू-कश्मीर आरक्षण अधिनियम, 2004 की धारा 3, 4, 6, 8 और 9 के अलावा आरक्षण नियम 2005 के कई नियमों को असांविधानिक बताया गया है। इसके साथ ही 2019 से 2024 तक जारी कई सरकारी आदेशों और भर्तियों को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सरकार ने यह तय करने के लिए कोई नया सर्वे, रिपोर्ट या स्वतंत्र आयोग नहीं बनाया कि किन वर्गों को वास्तव में आरक्षण की जरूरत है। इसके चलते मौजूदा आरक्षण प्रणाली मनमानी और अनुच्छेद 16(4) के खिलाफ बताई गई है।
याचिका में कई भर्ती विज्ञापन और नियुक्तियों को रद्द करने की मांग भी की गई है। इसमें कहा गया है कि जिन नियमों के तहत ये भर्तियां हो रही हैं, वे ही संविधान के खिलाफ हैं और समान अवसर की भावना को ठेस पहुंचाते हैं।
इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि आरक्षित वर्गों में जो क्रीमी लेयर वाले लोग हैं, उन्हें आरक्षण से बाहर किया जाए और एक ही परिवार को सिर्फ एक पीढ़ी तक ही इसका लाभ मिले। उन्होंने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को ओबीसी के रूप में परिभाषित करने और केंद्र सरकार की आरक्षण योजना का लाभ दिलाने की भी मांग की है। याचिका में यह भी कहा गया है कि आरक्षण को तर्कसंगत बनाते हुए उसका अनुपात ऐसा हो जिससे सभी वर्गों को न्याय मिल सके और योग्य युवाओं को बराबरी का अवसर मिले।


