भारत-यूएस व्यापार समझौते पर 3-4 माह में लग सकती है मुहर, कोर्ट के झटके के बावजूद जारी रहेगी डील

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इंडिया रिपोर्टर लाइव

नई दिल्ली 08 मार्च 2026। भारत और अमेरिका व्यापार समझौता अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के बड़े कानूनी झटके के बावजूद पटरी पर बना हुआ है। भारत इस समझौते को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने के पक्ष में है। भारत की रणनीति साफ है कि अनिश्चितता की स्थिति में रहने से बेहतर है कि समझौते से एक ठोस रक्षा कवच तैयार कर लिया जाए, क्योंकि ट्रंप प्रशासन के पास टैरिफ थोपने के कई अन्य ‘कानूनी हथियार’ मौजूद हैं। भारत का मानना है कि ट्रंप सरकार के जाने या किसी भविष्य की ‘नरम’ सरकार का इंतजार करना आत्मघाती हो सकता है। मोदी सरकार के शीर्ष सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी अदालत के फैसले के बाद मार्च की नियत तारीख या महीना भले ही पीछे छूट गया हो, लेकिन बातचीत जारी है। अब अगले तीन से चार माह में नई कानूनी परिस्थितियों के हिसाब से शर्तों को फिर से तराशा जाएगा।

सूत्रों का कहना है कि भारत अब ट्रंप सरकार के जाने या किसी भविष्य की नरम सरकार का इंतजार नहीं करना चाहता। इसके पीछे ठोस कूटनीतिक तर्क यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार जो फैसले ले लिए जाते हैं, वे  एक तरह से चिपक जाते हैं। उन्हें बाद में हटाना लगभग असंभव होता है। सरकार का मानना है कि अगर अभी एक ‘वर्किंग डील’ नहीं हुई, तो बाद में शर्तें और भी कठिन हो सकती हैं।

अमेरिकी तरकश के नए तीर
भले ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आपातकालीन कानून (आईईईपीए) के तहत लगे टैरिफ को अवैध करार दिया हो, लेकिन वाशिंगटन के पास अभी भी सेक्शन 301, 232, 122 और 338 जैसे घातक कानूनी विकल्प मौजूद हैं। इनमें से ‘सेक्शन 301’ अमेरिका को किसी भी देश की नीतियों को ‘अनुचित’ बताकर पूरे सेक्टर पर मनमाना जुर्माना या शुल्क लगाने की ताकत देता है। इसीलिए, भारत एक अंतिम सौदे पर जाना चाहता है, ताकि ऐसे मनमाने कानून का इस्तेमाल न हो सके।

डील क्यों नहीं हुई डिरेल
भले ही आईईईपीए का रास्ता बंद हुआ हो, लेकिन वाशिंगटन के पास सेक्शन 301 और 232 जैसे अन्य ‘कानूनी हथियार’ मौजूद हैं। ये कानून अमेरिकी संसद द्वारा राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों (जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा या अनुचित व्यापार) में टैरिफ लगाने की शक्ति देते हैं। यही कारण है कि भारत इस ‘तकनीकी ब्रेक’ को बातचीत का अंत नहीं, बल्कि शर्तों को फिर से संतुलित करने का अवसर मान रहा है।

महंगाई और चुनावी मजबूरी
भारत की नजर अमेरिका की घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी है। ट्रंप प्रशासन फिलहाल बहुत ही चुनिंदा तरीके से टैरिफ लगा रहा है ताकि अमेरिकी उपभोक्ताओं पर महंगाई की मार न पड़े। 90,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय होने के बावजूद अमेरिका में भोजन और ईंधन की कीमतें कम रखना वहां की सरकार की बड़ी राजनीतिक मजबूरी है। भारत को उम्मीद है कि इसी दबाव के बीच वह अपने स्मार्टफोन और फार्मास्युटिकल सेक्टर के लिए बेहतर रियायतें हासिल कर लेगा।

ट्रंप-चीन टैरिफ उदाहरण
इतिहास गवाह है कि व्यापारिक प्रतिबंधों को हटाना आसान नहीं होता। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में चीन पर जो भारी आयात शुल्क लगाए थे, उन्हें बाद में आई बाइडन सरकार ने भी नहीं हटाया। भारत इसी अवरोध से डर रहा है कि अगर अभी समझौता नहीं हुआ, तो भविष्य में कोई भी अमेरिकी सरकार इन टैरिफ को वापस नहीं लेगी।

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