रेलवे, रक्षा, गृह, डाक विभाग समेत 78 मंत्रालयों में 9.79 लाख पद खाली, सरकार ने जारी किए चौंकाने वाले आंकड़े

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इंडिया रिपोर्टर लाइव

नई दिल्ली 31 जुलाई 2025। जब देश के युवा नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं, रोज़गार मेले से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं तक में लंबी कतारें लगी रहती हैं, तब सरकार के मंत्रालयों और विभागों में लाखों पद खाली पड़े हैं — यह न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि कई गंभीर सवाल भी खड़े करता है। संसद में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों से इस गहरी खाई का खुलासा हुआ है, जो ‘हर साल 2 करोड़ नौकरियां’ देने के वादे से बिल्कुल मेल नहीं खाती।

क्या सामने आए हैं आंकड़े?
राज्यसभा में शिवसेना सांसद संजय राउत के सवाल पर केंद्र सरकार ने जो जानकारी दी, उसने सभी को हैरान कर दिया। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि मार्च 2021 तक केंद्र सरकार के अधीन 40 लाख से ज्यादा पद स्वीकृत थे, लेकिन इनमें से लगभग 9.79 लाख पद अभी तक खाली हैं।

यह आंकड़ा देश के 78 मंत्रालयों और विभागों से जुड़ा है, जिसमें से रेलवे, रक्षा, गृह मंत्रालय और डाक विभाग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी भारी रिक्तियां हैं। ये वही विभाग हैं जिन पर देश की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और प्रशासन की नींव टिकी होती है।

सरकार ने क्या कहा बचाव में?
सरकार ने स्पष्ट किया कि रिक्त पदों का बना रहना एक ‘निरंतर प्रक्रिया’ है। मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के मुताबिक, जैसे ही किसी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति, स्थानांतरण या पदोन्नति होती है, पद अस्थायी रूप से खाली हो जाते हैं। इन्हें भरने की प्रक्रिया समयानुसार चलती रहती है।

सरकार ने बताया कि 2022 से ‘मिशन रिक्रूटमेंट’ नाम का एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत देश के 45 से अधिक शहरों में रोजगार मेले आयोजित किए जा रहे हैं। मंत्रालयों को यह निर्देश भी दिए गए हैं कि वे समय पर रिक्तियों की सूचना भर्ती एजेंसियों को भेजें।

प्रमोशन और डेप्युटेशन को लेकर भी बनाई गई व्यवस्था
सरकार ने बताया कि 13A स्तर तक की नियुक्तियों के लिए विभाग स्वतंत्र रूप से डेप्युटेशन पर नियुक्ति कर सकते हैं। साथ ही, पदोन्नति के लिए एक मॉडल कैलेंडर भी तैयार किया गया है जिससे तय समय पर प्रमोशन की बैठकें हो सकें।

तो फिर बेरोजगारी क्यों बनी हुई है?
विपक्षी दलों और कई विशेषज्ञों का कहना है कि अगर लाखों पद खाली हैं, तो देश में बेरोजगारी का ग्राफ इतना ऊंचा क्यों है? यह सीधा-सीधा प्रशासनिक लापरवाही और नौकरशाही की धीमी प्रक्रिया को उजागर करता है। सवाल यह भी उठता है कि जब चुनावी मंच से प्रति वर्ष 2 करोड़ नौकरियों का वादा किया गया था, तो अब वह वादा क्यों अधूरा दिखता है?

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