अमेरिका में एच-1बी वीजा पर नई नीति, टीसीएस समेत इन भारतीय IT कंपनियों पर होगा सीधा असर

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वांशिगटन 20 सितंबर 2025। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एच-1बी वीजा पर सख्ती दिखाते हुए एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किया है। इसके बाद अब एच-1बी वीजा पर अमेरिका जाने वाले हर पेशेवर को एक लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) का अतिरिक्त शुल्क देना होगा। यह आदेश 12 महीनों तक लागू रहेगा। ऐसे में इसका अच्छा खासा असर भारतीय आईटी कंपनियों पर देखने को मिलेगा। हालांकि ट्रंप प्रशासन की माने तो इस कदम को लेकर उनका कहना है कि यह कदम वीजा सिस्टम के दुरुपयोग को रोकने के लिए उठाया गया है।

ये भारतीय आईटी कंपनियां होंगी ज्यादा प्रभावित
इस नए नियम से भारतीय कंपनियों जैसे टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और टेक महिंद्रा पर सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि ये कंपनियां एच-1बी वीजा पर सबसे ज्यादा निर्भर करती हैं। मामले में एक उदाहरण में बताया गया कि एक कंपनी को 2025 में 5,000 से ज्यादा एच-1बी वीजा मिले, लेकिन उसी समय कंपनी ने 15,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी भी की। वहीं एक दूसरी कंपनी को 1,700 वीजा मिले, लेकिन उसने 2,400 अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरी छीन ली। इसके साथ ही एक तीसरी कंपनी ने 2022 से अब तक 27,000 अमेरिकी कर्मचारियों को निकाला, लेकिन उसे 25,000 से ज्यादा एच-1बी वीजा मिले।

दुनियाभर में किन-किन कंपनियों को मिला सबसे ज्यादा एच-1बी वीजा?
अमेरिका की यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (यूएससीआईएस) के मुताबिक, साल 2025 में सबसे ज्यादा एच-1बी वीजा अमेजन को मिले हैं, जिसकी संख्या 10,044 है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को 5,505 वीजा के साथ दूसरा स्थान मिला है।

इसके बाद अन्य कंपनियों को जैसे कि माइक्रोसॉफ्ट  को 5,189 वीजा, मेटा (फेसबुक) को 5,123 वीजा, एप्पल को 4,202 वीजा, गूगल को 4,181 वीजा, डेलॉयट को 2,353 वीजा, इन्फोसिस को 2,004 वीजा, विप्रो को 1,523 वीजा और टेक महिंद्रा अमेरिका को 951 वीजा मिले हैं।

समझिए भारतीयों को कैसे होगी परेशानी?
बता दें कि ट्रंप के इस आदेश के बाद भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका जाना और महंगा हो जाएगा। भारतीय आईटी कंपनियों की अमेरिका में भर्ती प्रक्रिया प्रभावित होगी। दूसरी ओर अमेरिका में नौकरी ढूंढ रहे स्थानीय लोगों को राहत मिल सकती है।

इस फैसले पर ट्रंप प्रशासन ने क्या कहा?
इस मामले में ट्रंप प्रशासन का कहना है कि एच-1बी वीजा का गलत इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए ऐसा कदम उठाया गया है। जारी आदेश में बताया गया है कि 2000 से 2019 के बीच अमेरिका में विदेशी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित (एसटीईएम) वर्कर्स की संख्या 1.2 मिलियन से बढ़कर 2.5 मिलियन हो गई है। कंप्यूटर और मैथ से जुड़ी नौकरियों में विदेशी वर्कर्स की हिस्सेदारी 17.7% से बढ़कर 26.1% हो गई है। आईटी कंपनियां सस्ते विदेशी वर्कर्स लाकर अमेरिकियों की नौकरियां छीन रही हैं। गौरतलब है कि यह फैसला अभी एक साल तक लागू रहेगा, हालांकि प्रशासन ने इस बात का भी संकेत दिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।

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