वक्फ कानून के लाभ गिना, संघ दूर करेगा भ्रांतियां; देश में सेमिनारों का आयोजन करेगा राष्ट्रीय मुस्लिम मंच

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नई दिल्ली 09 अप्रैल 2025। वक्फ विधेयक को कानूनी जामा पहनाने के बाद संघ और सरकार ने इस मामले में विपक्ष से दो-दो हाथ करने की तैयारी शुरू कर दी है। इस क्रम में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच जहां देशभर में प्रेस कॉन्फ्रेंस और सेमिनारों के जरिए कानून के संबंध में फैलाई जा रही भ्रांतियां दूर करेगा, वहीं इसके लाभ भी गिनाएगा। वहीं सरकार की रणनीति वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग और इसमें सिर्फ अशराफ (ऊंची जातियों) की नुमाइंदगी मामले में विपक्ष को घेरने की है। संघ और सरकार की पहली कोशिश चुंनिदा अहम मुस्लिम संगठनों और विपक्ष की बनाई गई धारणा को तोड़ने की है। इनका कहना है कि इस कानून के जरिए सरकार मुसलमानों की संपत्ति और धार्मिक स्थलों पर कब्जा करना चाहती है। मुस्लिम मंच देशभर में 100 प्रेस कॉन्फ्रेंस और 500 सेमिनारों का आयोजन कर बताएगा कि यह कानून दरअसल गरीब और पिछड़े मुसलमानों को उनका हक दिलाने की है, जिसे आज तक इससे दूर रखा गया। सेमिनारों में पसमांदा समाज के मुखर वक्ताओं को बुलाया जाएगा। वे बताएंगे कि इस कानून का मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई प्रावधान ही नहीं है।

यह मुस्लिम समुदाय के हित में
राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के संरक्षक इंद्रेश कुमार ने कहा है कि कानून के संबंध में स्वार्थवश गलत धारणा बनाने की कोशिश की जा रही है। यह मुुस्लिम समुदाय के आत्मसम्मान, न्याय और समानता के अधिकार को और मजबूत करेगा। कानून भारतीय समाज में आपसी विश्वास और सहयोग को बढ़ाने वाला है न कि किसी के खिलाफ।

 सरकार को बाजी पलटने की उम्मीद
सरकार के एक मंत्री ने कहा कि दो महीने में यह सार्वजनिक हो जाएगा कि मुठ्ठी भर लोगों ने कैसे वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग किया। दस्तावेज में जहां मस्जिद दर्ज है, वहां दुकानें कैसे खुल गई। वक्फ भूमि पर मॉल कैसे बन गए। इन संपत्तियों के अघोषित वारिश कौन-कौन हैं। सबसे बड़ा सवाल कि वक्फ से असीमित आय हासिल करने की जगह इसे सीमित आय उपलब्ध कराने तक ही क्यों रखा गया? इन सारे सवालों के जवाब जब सामने आएंगे तब बाजी पलट जाएगी।

जदयू निश्चिंत, कहा-इससे कम नहीं मिल सकते वोट
वक्फ कानून के समर्थन के सवाल पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि बीते विधानसभा चुनाव में जदयू के सभी 11 मुसलमान उम्मीदवार हार गए। जब जदयू 2014 में भाजपा से नाता तोड़कर अलग लड़ी तब हम महज दो सीट ही जीत पाए। वह भी तब जब सीएम नीतीश की तरह किसी मुख्यमंत्री ने मुसलमानों के हित में बड़ा काम नहीं किया। यह कानून पिछड़े मुसलमानों के हक में है, इसलिए जदयू ने विधेयक का साथ दिया। 

बिहार बनेगा पहली प्रयोगशाला
कानून लागू होने के बाद पहला विधानसभा चुनाव इस साल अक्तूबर में बिहार में होगा। यहां मुसलमानों की आबादी 17 फीसदी है, जिसमें 73 प्रतिशत पसमांदा या पिछड़े मुसलमान हैं। जदयू और भाजपा इस कानून को अशराफ बनाम पसमांदा का रंग देना चाहती है। पहले ही राज्य में पसमांदा कार्ड खेल चुके सीएम नीतीश और उनकी पार्टी लगातार कह रही है कि उसने विधेयक का साथ पसमांदा मुसलमानों के हितों का ध्यान रख कर किया।

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