हिंदी विश्‍वविद्यालय में ‘वंदे मातरम् के सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक अवबोध’

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विषय पर राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी एवं प्रदर्शनी का हुआ उद्घाटन

वंदे मातरम्  मातृभूमि के समर्पण का गीत है : प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे

इंडिया रिपोर्टर लाइव

वर्धा 26 फरवरी 2026 । राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे ने कहा कि संपूर्ण वंदे मातरम् हमारी सभ्यता, संस्कृति और संस्कार का गीत है। यह हजारों लोगों के बलिदान का गीत है। वंदे मातरम् गीत अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण का गीत है। प्रो. मराठे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा एवं भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान, शिमला के संयुक्‍त तत्त्वावधान में फिल्‍म अध्‍ययन विभाग क्षेत्रीय केंद्र, प्रयागराज द्वारा वंदे मातरम् के सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवबोध विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्‍य अतिथि संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता विश्‍वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने की। इस अवसर पर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के  निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी, इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय कला केंद्र के सदस्‍य सचिव प्रो. सच्चिदानंद जोशी एवं विश्‍वविद्यालय के कुलसचिव क़ादर नवाज़ खान मंचासीन थे। 25-26 फरवरी इन दो दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का उद्घाटन कस्‍तूरबा सभागार में बुधवार, 25 फरवरी को किया गया।

प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे ने भारत के लोगों को सहोदर बताते हुए आगे कहा कि वंदे मातरम् ने देशभक्तों में मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव जगाया और यह एक प्रेरक उद्घोष बन गया। उन्होंने कहा कि हमारी पीढ़ियाँ वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाती आई हैं। इसके प्रथम छंद में मातृभूमि का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। वंदे मातरम् का पहला अवबोध सांस्कृतिक राष्ट्रदर्शन, दूसरा अवबोध सभी में एकत्व और तीसरा अवबोध स्वदेशी तथा बंधुता का है। उन्होंने कहा कि भारत को स्वयंपूर्ण और आत्मनिर्भर बनाना है तो हमें वंदे मातरम् की भावना को आत्मसात करना होगा। उन्होंने यह भी बताया कि वंदे मातरम् गीत पहली बार रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा वर्ष 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के  निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने राष्ट्रगान से राष्ट्रगीत तक की यात्रा पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अपने अध्ययन काल में उन्हें पाठ्यक्रम के माध्यम से वंदे मातरम् की विशेष जानकारी नहीं मिल सकी थी। उन्‍होने 1875 से 1895 के कालखंड का उल्‍लेख करते हुए कहा कि इस बीच आधारभूत ढांचे को तैयार करने में बड़ी भूमिका रही। भारत के इतिहास को भू-सांस्‍कृतिक आधार पर देखने से सही इतिहास का बोध होगा। उन्‍होंने आदि शंकराचार्य से शुरू हुई वंदे मातरम् की यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि यह भारतीय राष्‍ट्रीय आंदोलन की आधारभूत पृष्‍ठभूमि की यात्रा रही। उन्‍होंने इस आयोजन को शिमला से बाहर पहली बार हिंदी विश्‍वविद्यालय में आयोजित करने के लिए प्रसन्‍नता व्‍यक्‍त करते हुए कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा के प्रति साधुवाद व्‍यक्‍त किया।

अध्‍यक्षीय उद्बोधन में विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि वंदे मातरम् का सृजन राष्ट्रीय चेतना के प्रेरणात्मक दौर में 1875 के आसपास हुआ। उन्‍होंने कहा कि 1905 से 1937 तक आते-आते यह संर्घषमयी, बलिदानमयी राष्‍ट्र चेतना का आवाज बन गया। दासता से उद्वेलित राष्ट्रीय सोच से वंदे मातरम् का उदय हुआ। इस गीत में भारत का नहीं अपितु पूरी पृथ्‍वी माता का वर्णन है। इसे रवींद्रनाथ टैगोर ने धरती माता का वंदन का गीत कहा है। उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम् की रचना इस भावना के साथ की कि हम अंग्रेजी शासन के गीत नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि का गीत गाएँगे। बालमुकुंद गुप्त का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने वंदे मातरम् को राखी का धागा कहा था। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् भारत के स्व-जागरण का मंत्र है और इसमें भारत के भास्कर स्वरूप का दर्शन होता है। संगोष्‍ठी का उद्घाटन दीप प्रज्‍ज्‍वलन एवं डॉ. तेजस्‍वी एच.आर एवं समुह द्वारा कुलगीत गायन से किया गया तथा राष्‍ट्र गीत वंदे मातरम् के गायन से संगोष्‍ठी के उद्घाटन सत्र समापन किया गया।

‘वंदे मातरम् की सांगीतिक यात्रा’ विषय पर एक विशेष प्रदर्शनी

कार्यक्रम के अंतर्गत 25 फरवरी को अटल बिहारी वाजपेयी भवन में ‘वंदे मातरम् की सांगीतिक यात्रा’ विषय पर एक विशेष प्रदर्शनी आयोजित की गई, जिसमें वंदे मातरम् के ऐतिहासिक, सांगीतिक तथा सांस्कृतिक विकास को प्रस्तुत किया गया। प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रो. मिलिंद मराठे, प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी एवं कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने फीता काटकर एवं दीप प्रज्‍ज्‍वलन कर किया। प्रदर्शनी का संयोजन प्रदर्शनकारी कला विभाग अध्‍यक्ष डॉ. ओमप्रकाश भारती ने किया। यह प्रदर्शनी 26 फरवरी तक सभी के लिए खुली रहेगी। प्रदर्शनी देखने के लिए वर्धा के स्‍कूलों और महाविद्यालयों के विद्यार्थियों को आवाह्न किया गया।

संगोष्‍ठी के उद्घाटन सत्र का संचालन क्षेत्रीय केंद्र प्रयागराज के फिल्‍म अध्‍ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. यशार्थ मंजुल ने किया तथा कुलसचिव क़ादर नवाज़ ख़ान ने आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर महाराज गंगा सिंह विश्‍वविद्यालय, बीकानेर के कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित, वरिष्‍ठ संपादक अनंत विजय,  संपादक प्रफुल्‍ल केतकर, आईसीएएस एवं इतिहासकार अखिलेश झा, आईआरएस एवं इतिहासकार रश्मिता झा, ऐतिहासिक अध्‍ययन केंद्र जेएनयू, नई दिल्‍ली के डॉ. क्रिस्‍थु डॉस, संपादक राकेश मंजुल, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, वि‍धि संकाय की  प्रो. सीमा सिंह आदि सहित विश्‍वविद्यालय के अधिष्‍ठाता, विभागाध्‍यक्ष, शिक्षक एवं विद्यार्थी बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे।

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