
इंडिया रिपोर्टर लाइव
उज्जैन, 05 अगस्त 2026। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वोपरि कालों के काल बाबा महाकाल की नगरी में हर सुबह एक अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। दुनिया में एकमात्र श्री महाकालेश्वर मंदिर ऐसा है, जहां प्रतिदिन सुबह भस्म आरती की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज बाबा को जो भस्म अर्पित की जाती है, पहले वह श्मशान की राख होती थी? वर्तमान में ऐसा नहीं किया जाता। अब बाबा महाकाल को अर्पित की जाने वाली भस्म महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा विशेष विधि से तैयार की जाती है। महानिर्वाणी अखाड़ा ही शुक्ल यजुर्वेद के विशेष मंत्रों के साथ यह भस्म बाबा महाकाल को अर्पित करता है।
बाबा महाकाल को अर्पित की जाने वाली भस्म के बारे में महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरी महाराज ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि पहले भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल को शव की राख अर्पित की जाती थी, लेकिन वर्तमान में चढ़ाई जाने वाली भस्म विशेष रूप से तैयार की जाती है। उन्होंने बताया कि इस भस्म के निर्माण के लिए कपिला गाय के कंडे लाए जाते हैं। इन कंडों को पीपल, वट, शमी, पलाश, बेर तथा अन्य औषधीय सामग्री के साथ श्री महाकालेश्वर मंदिर में जलने वाली अखंड धूनी में प्रज्ज्वलित किया जाता है। अग्नि शांत होने के बाद राख को बाहर निकालकर तीन से चार बार अच्छी तरह छाना जाता है।
बाबा महाकाल को अर्पित की जाने वाली भस्म के निर्माण के दौरान पूरी तरह शुद्धता का ध्यान रखा जाता है। महाकालेश्वर मंदिर में सबसे पहले होने वाली आरती के दौरान भगवान के पूजन, अभिषेक और श्रृंगार के बाद शिवलिंग को सफेद वस्त्र से ढक दिया जाता है। इसके बाद शुक्ल यजुर्वेद के मंत्रोच्चार के साथ प्रतिदिन बाबा महाकाल को यह पवित्र भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस भस्म को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं, उन्हें भगवान महाकाल का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही सभी प्रकार के रोग और दुखों से मुक्ति मिलती है।
ऐसे होती है भस्म आरती
सुबह सबसे पहले होने वाली आरती में बाबा महाकाल के पूजन, अभिषेक और श्रृंगार के बाद शिवलिंग को सफेद वस्त्र से ढका जाता है। इसके बाद शुक्ल यजुर्वेद के मंत्रोच्चार के साथ महानिर्वाणी अखाड़े के साधु यह पवित्र भस्म बाबा को अर्पित करते हैं। आज की भस्म आरती में बाबा का श्रृंगार भांग, त्रिपुंड, चंद्रमा और बेलपत्र से किया गया। मान्यता है कि जो भक्त इस भस्म को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करता है, उसे महाकाल का आशीर्वाद प्राप्त होता है और वह रोग-दुख से मुक्त हो जाता है।


