हाईकोर्ट ने खारिज की सरकार की अपील

इंडिया रिपोर्टर लाइव
जबलपुर, 30 सितंबर 2026। तीस साल तक चले कानूनी विवाद के बाद तत्कालीन पटवारी को तीन सौ रुपये रिश्वत लेने के मामले में हाईकोर्ट से राहत मिली है। हाईकोर्ट जस्टिस संजय एस. कलगांवकर की एकल पीठ ने सरकार की अपील को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को दोषमुक्त किए जाने के आदेश को उचित करार दिया है।
सागर जिले के खुरई क्षेत्र के तत्कालीन पटवारी मुन्नालाल को तीन सौ रुपये की रिश्वत लेने के अपराध में जिला न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने के खिलाफ सरकार की तरफ से साल 1998 में हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। अभियोजन के अनुसार 17 अक्टूबर 1996 को डुप्लीकेट भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका जारी करने के एवज में तत्कालीन पटवारी को शिकायतकर्ता वीर सिंह से तीन सौ की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया था। न्यायालय ने आरोपी को दिसंबर 1997 में दोषमुक्त कर दिया था। एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन को विश्वसनीय रूप से साबित करना आवश्यक था कि रकम अवैध के रूप से मांगी और स्वीकार की गई थी। रिश्वत मांग की मूल रिकॉर्डिंग ट्रायल कोर्ट में सत्यापित नहीं की गई। आरोपी की आवाज की पहचान नहीं कराई गई और रिकॉर्डिंग की पूर्णता एवं शुद्धता का पर्याप्त प्रमाण भी नहीं दिया गया। इसलिए ट्रांसक्रिप्ट को मांग के विश्वसनीय नही माना जा सकता है।
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता वीर सिंह पर 325 और ब्याज की सरकारी बकाया राशि थी। गवाहों और दस्तावेजों से यह संभावना सामने आई कि बरामद 300 रुपये सरकारी बकाया की अदायगी से संबंधित हो सकते थे। इसके साथ ही शिकायतकर्ता वीर सिंह के बयान में कई महत्वपूर्ण विसंगतियां सामने आईं। अलग-अलग मौकों पर कथित रिश्वत की मांग 450 और 500 रूपये बताई गई। किन लोगों के मौजूदी में रिश्वत की मांग की गई, इस संबंध में भी अलग-अलग बयान दिए गए।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ रिश्वत की रकम की बरामदगी और फिनालफ्थेलीन परीक्षण से रिश्वत मांगने और अवैध रूप से स्वीकार करने का अपराध सिद्ध नहीं होता। ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष उचित और साक्ष्य पर आधारित है, तो बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। एकल पीठ ने उक्त आदेश के साथ सरकार की अपील को निरस्त कर दिया।


