94 साल बाद जातीय जनगणना को मिली मंजूरी: क्यों रुकी रही इतनी लंबी अवधि और अब क्या बदला मोदी सरकार का रुख?

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इंडिया रिपोर्टर लाइव

नई दिल्ली 01 मई 2025। भारत में जातीय जनगणना की आखिरी बार गिनती 1931 में हुई थी। उसके बाद से भले ही हर दस साल पर जनगणना होती रही हो, लेकिन जाति के आधार पर आंकड़े नहीं जुटाए गए। 1941 में जरूर जातिगत आंकड़े एकत्र किए गए, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध की वजह से उन्हें प्रकाशित नहीं किया गया। आज़ादी के बाद, 1951 से अब तक सिर्फ अनुसूचित जातियों और जनजातियों की गिनती होती रही, लेकिन ओबीसी और सामान्य वर्ग की जातियों का विवरण नहीं जोड़ा गया। आजादी के साथ ही देश पहले ही धार्मिक आधार पर बंट चुका था। ऐसे माहौल में सरकार ने सामाजिक एकता बनाए रखने के लिए जातिगत जनगणना को रोक दिया। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इसे ब्रिटिश नीति का समाज तोड़ने वाला औजार बताया और खारिज कर दिया। यही नीति आगे चलकर भारतीय प्रशासन की परंपरा बन गई।

विपक्ष का दबाव और राज्यों की पहल ने बढ़ाया केंद्र पर दबाव
हाल के वर्षों में बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना ने अपने-अपने राज्यों में जातिगत सर्वे कराकर आंकड़े सार्वजनिक कर दिए। भले ही ये तकनीकी रूप से ‘जनगणना’ नहीं थीं, लेकिन इनके राजनीतिक असर बड़े रहे। साथ ही कांग्रेस, सपा, आरजेडी, डीएमके जैसे दलों ने केंद्र सरकार पर जातिगत जनगणना कराने का दबाव बनाना शुरू किया। राहुल गांधी ने इसे अपने अभियान का अहम हिस्सा बनाया और बीजेपी व मोदी सरकार को ओबीसी और दलित विरोधी ठहराने लगे। संघ के भी कुछ संकेतों के बाद माहौल और बदला।

मोदी सरकार ने क्यों बदला अपना रुख?
मोदी सरकार ने 2021 तक साफ कर दिया था कि वह ओबीसी या अन्य जातियों की गिनती नहीं करेगी। कोर्ट और संसद में यह कहकर बात टाल दी गई थी कि यह प्रशासनिक रूप से जटिल और महंगा है। लेकिन बिहार और अन्य राज्यों के जातिगत सर्वे, विपक्ष का सियासी दबाव और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे से सरकार का रुख बदला। अंततः 2025 की सीसीपीए बैठक में प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में जातीय जनगणना को मंजूरी दी गई।

क्या है जातीय जनगणना और क्यों जरूरी है?
जनगणना का उद्देश्य देश की जनसंख्या की सही संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को जानना होता है। लेकिन अगर इसमें जातीय विवरण जोड़ा जाए, तो यह समझना आसान होगा कि कौन सी जाति किस सामाजिक या आर्थिक स्तर पर है। इससे नीतियों और योजनाओं को अधिक न्यायसंगत तरीके से बनाया जा सकता है। जातीय जनगणना से यह स्पष्ट होगा कि ओबीसी, दलित, सामान्य या अन्य जातियों की सच्ची स्थिति क्या है — शिक्षा, रोजगार, आय और अवसरों के स्तर पर।

क्या आगे की राह आसान है?
हालांकि केंद्र सरकार ने निर्णय तो ले लिया है, लेकिन अभी तक जातीय जनगणना की तिथि तय नहीं हुई है। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में संसाधन, तैयारी और राजनीतिक सहमति की जरूरत होगी। वहीं, यह भी देखा जाना बाकी है कि आंकड़े कैसे और कब सार्वजनिक किए जाएंगे।

विपक्षी दलों ने बनाया सियासी माहौल
भारत में 94 साल बाद जातिगत जनगणना का रास्ता साफ होना एक ऐतिहासिक फैसला है। यह कदम सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा बदलाव लाने वाला हो सकता है, बशर्ते इसे निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ अंजाम दिया जाए। यह सिर्फ गणना नहीं, भारत की सामाजिक तस्वीर को समझने की एक नई शुरुआत है।

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