अदालत में नहीं टिक सकी पुलिस की थ्योरी

इंडिया रिपोर्टर लाइव
भोपाल, 06 अगस्त 2026। बहुचर्चित टीला जमालपुरा फायरिंग और गैंगवार मामले में पुलिस की विवेचना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। अभियोजन पक्ष अदालत में यह तक सिद्ध नहीं कर सका कि वारदात के दौरान गोली आखिर किसने चलाई थी। साक्ष्यों के अभाव और कमजोर पैरवी के चलते जिला अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए कुख्यात गैंगस्टर जुबेर मौलाना समेत सभी पांच आरोपियों को बरी कर दिया। करीब 440 दिन तक जेल में रहने के बाद आरोपियों के बरी होने से पुलिस कमिश्नरेट की विवेचना, चार्जशीट और अभियोजन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारी के अनुसार, घटना 6 मई 2025 को तड़के करीब 5:45 बजे टीला जमालपुरा थाना क्षेत्र के इंद्रानगर में हुई थी। पुलिस एफआईआर के अनुसार, गैंगस्टर जुबेर मौलाना अपने साथियों शरीफ उर्फ बच्चा, फैसल खान, सन्नी उर्फ शकील और जहीर खान के साथ घातक हथियारों से लैस होकर वहां पहुंचा था। आरोप था कि क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित करने की नीयत से आरोपियों ने हवाई फायरिंग कर दहशत फैलाई और एक युवक पर जानलेवा हमला किया। पुलिस ने हत्या के प्रयास समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर चालान अदालत में पेश किया था।
अदालत में ढह गई पुलिस की थ्योरी
करीब डेढ़ साल तक चले इस चर्चित मुकदमे में पुलिस का पूरा मामला अदालत में टिक नहीं सका। सुनवाई के दौरान फरियादी, घायल युवक और सभी प्रत्यक्षदर्शी अपने पुलिस को दिए गए बयानों से मुकर गए। पुलिस का दावा था कि जुबेर के कब्जे से एक देसी पिस्टल तथा अन्य आरोपियों के पास से तलवार और चाकू बरामद किए गए थे। हालांकि, जिन स्वतंत्र गवाहों को जब्ती का साक्षी बनाया गया था, उन्होंने अदालत में पुलिस कार्रवाई का समर्थन करने से इनकार कर दिया। अभियोजन पक्ष यह भी साबित नहीं कर सका कि जब्त हथियार प्रतिबंधित श्रेणी के थे और उनकी बरामदगी विधि-सम्मत तरीके से की गई थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है। प्रस्तुत साक्ष्य भरोसेमंद नहीं हैं, इसलिए आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
पुलिस जांच पर उठे चार बड़े सवाल
यदि मौके पर फायरिंग हुई थी, तो पुलिस यह साबित क्यों नहीं कर सकी कि गोली किस आरोपी के हथियार से चली? जब्ती के स्वतंत्र गवाह अदालत में अपने बयान से क्यों मुकर गए? क्या जब्ती की प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई? इतने गंभीर मामले में चालान पेश करने से पहले क्या साक्ष्यों का पर्याप्त कानूनी परीक्षण नहीं किया गया? क्या गवाहों की सुरक्षा और उन पर संभावित दबाव को रोकने के लिए पुलिस ने कोई प्रभावी कदम उठाए थे?


