हाई कोर्ट ने सार्वजनिक नहीं की रिपोर्ट

इंडिया रिपोर्टर लाइव
इंदौर, 25 अगस्त 2026। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से हुई 36 मौतों की जांच को लेकर मंगलवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। पीड़ितों की ओर से दायर जनहित याचिका में याचिकाकर्ता के वकील ने 600 से अधिक पन्नों की जांच रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए उसकी प्रति उपलब्ध कराने की मांग की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से बांटी या सर्कुलेट नहीं की जा सकती। हालांकि, रिपोर्ट हाईकोर्ट रजिस्ट्रार को सौंप दी गई है और संबंधित वकील वहां जाकर इसका अध्ययन कर सकते हैं।
शहर में आ रहे दूषित पानी का मुद्दा उठा
सुनवाई के दौरान भागीरथपुरा हादसे के साथ-साथ इंदौर के अन्य क्षेत्रों में लगातार आ रही दूषित पानी की समस्याओं पर भी चर्चा हुई। कोर्ट ने कहा कि शहर में लगातार गंदा पानी आ रहा है, इस पर नगर निगम और प्रशासन की क्या तैयारियां हैं? गौरतलब है कि भागीरथपुरा का दूषित पानी कांड केवल इंदौर या मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रहा था। 36 लोगों की मौत और सैकड़ों लोगों के बीमार पड़ने के बाद इस घटना ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। मामला इतना गंभीर था कि इस पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी हुए और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठे। आज इस मामले में करीब 8 महीने से चल रही जांच का अहम पड़ाव आ गया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ के निर्देश पर गठित 1 सदस्यीय जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट तैयार की। 600 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट हाई कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में जमा की गई।
600 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट के लिए विभिन्न विभागों से जुटाए गए दस्तावेज
रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में गठित आयोग ने घटना के कई पहलुओं की पड़ताल की। जांच के दौरान संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए गए और प्रभावित लोगों के बयान भी लिए गए। आयोग ने जांच के दौरान इंदौर नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग सहित संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए। प्रभावित क्षेत्र के लोगों से भी लिखित बयान आमंत्रित किए गए। अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका के साथ घटना के दौरान किए गए राहत और स्वास्थ्य संबंधी इंतजामों की भी पड़ताल की गई। मामला संवेदनशील होने के कारण जांच की प्रक्रिया को गोपनीय रखा गया।
अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच
जांच का दायरा केवल पाइप लाइन या दूषित पानी के स्रोत तक सीमित नहीं था। आयोग ने यह भी देखा कि संबंधित विभागों के अधिकारियों ने अपने दायित्व का पालन किया था या नहीं। तत्कालीन निगम कमिश्नर दिलीप यादव और तत्कालीन अपर आयुक्त टोहित सिसोनिया की भूमिका भी जांच के दायरे में रही। इनके अलावा कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव, स्थानीय पार्षद कमल वाघेला सहित अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल की गई।


