कूटनीति : मोदी की नेपाल यात्रा रिश्तों को बनाएगी और मजबूत, 16 मई को लुंबिनी में होंगे पीएम मोदी

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इंडिया रिपोर्टर लाइव

नई दिल्ली 11 मई 2022। पीएम नरेंद्र मोदी नेपाल यात्रा के दौरान 16 मई को बुद्ध पूर्णिमा पर गौतम बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी में होंगे। नेपाल के पीएम शेर बहादुर देउबा के आमंत्रण पर हो रहे इस दौरे को भारत की सौम्यता भरी शक्ति को प्रोत्साहित करने का प्रयास होगा। नेपाल-भारत में गौतम बुद्ध के जरिए संबंधों को नई ऊर्जा व मजबूती देने के अवसर की तरह भी यह यात्रा देखी जा रही है। इससे पहले मोदी ने अक्तूबर 2021 में कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का शुभारंभ किया था, जो न केवल क्षेत्रीय नागरिकों, बल्कि विदेशी बौद्ध तीर्थयात्रियों के लिए सुविधा बढ़ाने वाला साबित हुआ। यहां से बुद्ध के महापरिनिर्वाण मंदिर जाना आसान हुआ तो वहीं बुद्ध-सर्किट का भी विकास होने लगा।

यह न केवल नेपाल, बल्कि बौद्ध धर्म से जुड़े कई देशों से भारत के संबंधों को मजबूत करने में मदद दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों और कई संस्थाओं का मानना है कि अपने यहां मौजूद गौतम बुद्ध से जुड़े विभिन्न स्थलों के जरिए भारत अपना काफी प्रभाव बढ़ा सकता है।

इकोनॉमिक फोरम ने बताई तीन वजहें
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के जियो स्ट्रेटेजी प्लेटफॉर्म के अनुसार भारत में भले ही बौद्ध धर्म को मानने वाले कम हैं, लेकिन इसकी तमाम विरासत यहां मौजूद हैं। भारत इनके जरिए बुद्ध-कूटनीति का दावा कर सकता है।

इसकी तीन अहम वजहें हैं

  1. बौद्ध धर्म भारत में जन्मा, यह तथ्य बुद्ध धर्म की ऐतिहासिक विरासत पर भारत को सबसे बड़ी वैधता देता है
  2. बोधगया, सारनाथ, नालंदा जैसे बौद्ध धर्म से जुड़े असंख्य स्थल भारत में हैं
  3. भारत ने तिब्बत से निर्वासित बौद्धों के सबसे बड़े नेतृत्व दलाई लामा को धर्मशाला में शरण दी, जिससे उसे बौद्ध धर्म के संरक्षक की छवि मिली

एशिया के कई देशों पर डाल सकते हैं प्रभाव
बौद्धों के सबसे पुराने विचारों में शामिल थेरवाद से भारत के ऐतिहासिक संबंध हैं। इसके बल पर भारत इस धर्म के कई मतों के बीच वार्ता के लिए पुल बन सकता है। इसका फायदा सरकार की पड़ोसी-प्रथम, लुक-ईस्ट और एक्ट ईस्ट जैसी नीतियों में मिल सकता है। यहां स्थित अधिकतर देशों में बौद्ध धर्म लोकप्रिय है। इनके बीच भारत अपना प्रभाव बौद्ध संस्कृति के जरिए बढ़ा सकता है।
बुद्ध मंदिर के लिए एक दिन
पीएम मोदी ने गौतम बुद्ध को अपने वक्तव्यों से लेकर कूटनीतिक विदेश यात्राओं में हमेशा महत्व दिया। श्रीलंका, चीन, सहित बुद्ध धर्म के प्रभाव वाले देशों में दिए अपने वक्तव्यों में भी इन साझी सांस्कृतिक जड़ों संबंधों का उल्लेख उन्होंने हमेशा किया। इन देशों में यात्रा में जब भी संभव होता है, वे एक दिन बौद्ध मंदिरों में जाने के लिए हमेशा आरक्षित रखते हैं।

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