
इंडिया रिपोर्टर लाइव
वाराणसी, 06 नवंबर 2026। काशीराज के वैद्य की ओर से शुरू कराई गई एक दिवसीय धन्वंतरि दर्शन की परंपरा का आज 326वां साल है। पूजा और दर्शन में आयुर्वेद की दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भोग लगाकर भक्तों में प्रसाद बंटेगा और उसी से पूरे साल मरीजों का इलाज भी किया जाएगा। अब तक तीन प्रधानमंत्री, दो राष्ट्रपति सहित कई विदेशी राष्ट्राध्यक्षों ने धन्वंतरि निवास की दवा का इस्तेमाल किया है। पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह का पैरालिसिस भी यहीं से ठीक हुआ।
इनके अलावा पं. जवाहर लाल नेहरू, दलाई लामा, इंदिरा गांधी, राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, ज्ञानी जैल सिंह और नेपाल के कोइराला परिवार के साथ ही पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव की व्याधियां भी यहीं ठीक हुईं।
शुक्रवार यानी आज सुड़िया स्थित धन्वंतरि निवास पर शाम पांच बजे से रात 11 बजे के बीच करीब 40 से 50 हजार श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है। भक्तों को जड़ी बूटी के अलावा लड्डू और फल देकर विशेष इत्र भी लगाया जा रहा है। काशी के राजवैद्य पंडित हरि शास्त्री की 10वीं पीढ़ी अब इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। परिवार का दावा है कि रोग कैसा भी हो ठीक होता है। लकवा, पैरालिसिस, किडनी और न्यूरोलॉजिकल बीमारी बिना किसी साइड इफेक्ट के ठीक होती है।
निवास में भव्य सिंहासन पर स्थापित भगवान की अष्टधातु की प्रतिमा की पूजा होगी और दर्शन भी होंगे। ब्रह्म मुहूर्त में भगवान धन्वंतरि को स्नान कराने के बाद विशेष शृंगार और पूजन होगा।
लड्डू-पेड़े और इत्र के साथ जड़ी-बूटियों और रत्नों का भोग लगाकर भक्तों में बांटा जाएगा। फिर पूरे साल भर इन्हीं जड़ी-बूटियों और रत्नों से दवाएं बनाकर बनाकर मरीजों को दी जएंगी। यही भक्तों को प्रसाद स्वरूप भी बांटा जाता है।
अफगानिस्तान से केसर और खाड़ी देशों से आता है अगर-तगर
राजवैद्य परिवार के पं. समीर कुमार शास्त्री के अनुसार, औषधियों की विशेषता ये भी है कि सभी दवाएं अपने घर में ही देखरेख में बनाई जाती हैं। सारी दवाएं खुद ही बनाते हैं। केसर अफगानिस्तान और अगर-तगर दुबई सहित खाड़ी देशों से मंगाए जाते हैं। बाकी सामान भारत के ही अलग-अलग राज्यों से मंगवाकर दवाएं बनाई जाती हैं।
पं. शिव कुमार शास्त्री ने विदेशों तक पहुंचाया
पं. समीर ने बताया कि धन्वंतरि औषधियों को सबसे ज्यादा बढ़ावा बाबू नंदन, पंडित रघुनंदन, पंडित राम शंकर के समय में मिला। वहीं, पं. शिव कुमार शास्त्री ने इसे विदेशों तक पहुंचा दिया। उनके अलावा पंडित गिरधारी लाल, कन्हैया लाल, बाल मुकुंद ने काफी प्रचार किया।


