अमेरिका ने अपाचे हेलीकॉप्टर और M777 तोपों की सपोर्ट डील को दी मंजूरी, सैन्य ताकत होगी और मजबूत

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इंडिया रिपोर्टर लाइव

नई दिल्ली 19 मई 2026। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत होता जा रहा है। इसी कड़ी में अमेरिका ने भारत को अपाचे हेलीकॉप्टर और M777A2 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर तोपों के लिए सपोर्ट सर्विस और संबंधित उपकरणों की संभावित बिक्री को मंजूरी दे दी है। अमेरिकी विदेश विभाग ने इस फैसले की आधिकारिक जानकारी दी। अमेरिका के अनुसार, अपाचे हेलीकॉप्टरों के लिए सपोर्ट सर्विस डील की अनुमानित कीमत करीब 198.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर है। वहीं M777A2अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर के लिए लॉन्ग-टर्म सपोर्ट डील लगभग 230 मिलियन अमेरिकी डॉलर की हो सकती है।

किन कंपनियों को मिलेगा कॉन्ट्रैक्ट? 
अपाचे हेलीकॉप्टर सपोर्ट डील के लिए प्रमुख कंपनियां बोइंग कंपनी और लॉकहीड मार्टिन होंगी। वहीं M777 हॉवित्जर सपोर्ट प्रोग्राम के लिए ब्रिटेन की रक्षा कंपनी बीएई सिस्टम्स को मुख्य ठेकेदार बनाया गया है।

भारत को क्या-क्या मिलेगा?
अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक भारत ने AH-64E अपाचे हेलीकॉप्टरों के लिए इंजीनियरिंग, टेक्निकल और लॉजिस्टिक सपोर्ट सेवाओं की मांग की थी। इसके अलावा तकनीकी डेटा, पब्लिकेशन, सैनिकों की ट्रेनिंग और अन्य प्रोग्राम सपोर्ट भी इस डील का हिस्सा होंगे। वहीं M777A2 हॉवित्जर के लिए स्पेयर पार्ट्स, रिपेयर, ट्रेनिंग, टेक्निकल सहायता, फील्ड सर्विस प्रतिनिधि और लॉजिस्टिक सपोर्ट जैसी सुविधाएं शामिल रहेंगी। यह संभावित रक्षा सौदा अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल (FMS) चैनल के तहत किया जाएगा। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि यह समझौता भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेगा।

भारत की सैन्य क्षमता होगी मजबूत
अमेरिका का मानना है कि इस डील से भारत की वर्तमान और भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की क्षमता बढ़ेगी। साथ ही यह सौदा भारत की घरेलू सुरक्षा को मजबूत करने और क्षेत्रीय खतरों को रोकने में मदद करेगा। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि भारत इन सेवाओं और उपकरणों को अपनी सेना में आसानी से शामिल कर सकेगा। साथ ही इस रक्षा सौदे से क्षेत्रीय सैन्य संतुलन पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ेगा सहयोग
अमेरिका ने भारत को हिंद-प्रशांत और दक्षिण एशिया क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता, शांति और आर्थिक प्रगति के लिए अहम साझेदार बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रक्षा सहयोग चीन और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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