सियासत के साइड इफैक्ट : पंजाब की राजनीति पर हावी हो रही हैं किसान जत्थेबंदियां

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जालंधर 11 सितम्बर 2021। पिछले नौ माह से दिल्ली बॉर्डर पर बैठी किसान जत्थेबंदियों ने पंजाब की राजनीतिक पिच पर खेल रहे तमाम नेताओं के घुटने लगवा दिए हैं। एक तरह से पंजाब की राजनीति पर किसान जत्थेबंदियां हर तरह से हावी हो गई हैं और 2022 के चुनावों में किसानी मुद्दे ही उछलेंगे। वहीं पार्टीबाजी के कारण जमीनी स्तर पर गांवों में किसानों के गुट बंटने लगे हैं। शुक्रवार को चंडीगढ़ में जिस तरह किसानों ने कचहरी लगाकर तमाम दिग्गजों को अपना फरमान सुनाया है, उससे यह बात साफ हो गई है कि पंजाब में किसान यूनियनें राजनीति पर पूरी तरह से हावी हैं। दरअसल, पंजाब के गांवों में कांग्रेस, अकाली दल, आम आदमी पार्टी व बसपा का खासा जनाधार है। 117 विधानसभा सीटों में 89 ऐसी हैं, जहां किसान अहम भूमिका अदा कर सकते हैं। जबकि 28 सीटें ऐसी हैं, जहां किसानों का कोई प्रभाव नहीं है। इन 28 सीटों समेत 45 सीटों पर भाजपा पूरा फोकस कर रही है, जबकि बाकी दलों की नजर 89 सीटों पर है।

इन सीटों पर जहां कांग्रेस का खासा जनाधार है, वहीं अकाली दल व आम आदमी पार्टी भी पीछे नहीं है। पंजाब के गांवों में एससी वर्ग की आबादी भी अच्छी खासी है और बसपा भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहती। खासकर दोआबा के ग्रामीण इलाकों में बसपा का खासा वोट बैंक है और यह वोट किसानों के आंदोलन के साथ ही प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। यही नहीं पंजाब में 75% लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर खेती से जुड़े हैं। प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोगों की बात करें तो इसमें किसान, उनके खेतों में काम करने वाले मजदूर, उनसे फसल खरीदने वाले आढ़ती और खाद-कीटनाशक के व्यापारी शामिल हैं। खेती के जरिये सभी लोग एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं। इनके साथ ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री भी जुड़ जाती है। आढ़तियों से फसल खरीदकर आगे सप्लाई करने वाले ट्रेडर्स और एजेंसियां भी खेती से ही जुड़ी हुई हैं। अगले फेज में शहर से लेकर गांव के दुकानदार भी किसानों से ही जुड़े हैं। फसल अच्छी होती है तो किसान खर्च भी करता है। इसके जरिये कई छोटे कारोबार भी चलते रहते हैं।

पंजाब में खेतीबाड़ी की जमीन 7.442 मिलियन हेक्टेयर है। जिसका मालिकाना हक 10.93 लाख लोगों के पास है। इनमें 2.04 लाख (18.7%) छोटे और सीमांत किसान हैं। 1.83 लाख (16.7%) छोटे किसान हैं, जबकि 7.06 लाख (64.6%) किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन है। पंजाब की तमाम राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की नजर इन किसानों पर है और गांवों में हालात ये बन रहे हैं कि कांग्रेस, अकाली, आप, बसपा के चक्कर में किसान आपस में बंटने शुरू हो गए हैं। जो किसान ट्रैक्टर ट्रालियों में एक साथ दिल्ली बार्डर पर जाते थे, वह अपने-अपने गुट के साथ जा रहे हैं।  किसान नेता बलवंत सिंह शाहकोट का कहना है कि पंजाब के 75 फीसदी लोगों का मुद्दाकिसानी है, इन तीन कानूनों को वापस करवाना हमारा मिशन है। चुनावों के कारण हो रही रैलियों से हमारे बीच किसानी भाईचारा बंट रहा है। गांवों में राजनीति शुरू हो गई है, किसानी मुद्दा कमजोर पड़ रहा है।

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