अध्ययन में खुलासा: हिमाचल में पर्यटन से बदल रही सांस्कृतिक पहचान, लाहौल-स्पीति में सबसे बेहतर विरासत संरक्षण

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शिमला 28 जून 2026। हिमाचल प्रदेश में पर्यटन से कमाई तो अच्छी हो रही है मगर राज्य की सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान भी बदल रही है। सिर्फ जनजातीय जिले लाहौल स्पीति में ही विरासत का संरक्षण सबसे अच्छा है। शिमला और कुल्लू के शहरी क्षेत्रों में सांस्कृतिक मूल्यों में तेजी से बदलाव हो रहा है। यह खुलासा नाइजीरिया विश्वविद्यालय के संचार विभाग का इयाना जर्नल ऑफ इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज नामक अंतरराष्ट्रीय जर्नल कर रहा है। इसमें हमीरपुर स्थित निजी विश्वविद्यालय के डिविजन ऑफ हॉस्पिटेलिटी एंड होटल मैनेजमेंट के सहायक आचार्य डॉ. विनीत कुमार व डॉ. अक्षय ठाकुर के निर्देशन में रिसर्च स्कॉलर अक्षय दहल, मोहित अत्री और प्रशांत बलोडी का अध्ययन छपा है। अध्ययन के अनुसार हर साल 1.70 करोड़ से अधिक पर्यटक आते हैं, जो स्थानीय आबादी से लगभग तीन गुना हैं। सैलानी आर्थिक उन्नति तो बढ़ा रहे हैं पर उनकी वजह से पहाड़ी समुदायों की पारंपरिक पहचान भी बदल रही है। शोधकर्ताओं ने शिमला, कुल्लू-मनाली, कांगड़ा-धर्मशाला और लाहौल-स्पीति के 450 स्थानीय निवासियों का साक्षात्कार किया। इन क्षेत्रों का सर्वेक्षण भी किया। लोगों के अनुभवों को सांस्कृतिक संरक्षण सूचकांक, सामाजिक-सांस्कृतिक संपर्क और सामुदायिक सांस्कृतिक लचीलापन जैसे तीन पैमानों पर मापा गया। शिमला और कुल्लू-मनाली में सांस्कृतिक संरक्षण का स्कोर काफी कम रहा। 

अध्ययन के अनुसार यहां स्थानीय संस्कृति और परंपराएं अब केवल दिखावे की वस्तुएं बनकर रह गई हैं। इसके विपरीत लाहौल-स्पीति के दूरदराज इलाकों में सांस्कृतिक संरक्षण सबसे मजबूत पाया गया। अध्ययन के अनुसार यहां मजबूत स्थानीय पंचायतों, भौगोलिक स्थिति और सक्रिय स्थानीय शासन ने संस्कृति को बिखरने से बचाया है। यह समुदाय अपनी पवित्र परंपराओं से समझौता किए बिना पर्यटन को सफलतापूर्वक संभाल रहे हैं। जिन क्षेत्रों में पर्यटन के फैसलों में स्थानीय समुदाय की भागीदारी अधिक थी, वहां न केवल सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रही, बल्कि मानसिक संतुष्टि भी बढ़ी।

नीति निर्माताओं को चेतावनी और सुझाव: यह अध्ययन हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग और अन्य नीति निर्माताओं को चेतावनी दे रहा है कि उन्हें यूनेस्को के मानकों के अनुरूप नीतियां बनानी होंगी।  पर्यटकों का आना अच्छी बात है पर संस्कृति केवल पर्यटकों के मनोरंजन का साधन बनकर न रह जाए। उसे मूल पहचान के साथ सुरक्षित रखना होगा। 

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