हिंदू हो या मुस्लिम, कोरोना मृतकों की एक जैसी अंतिम यात्रा

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हाइलाइट्स

  • कोरोना वायरस के चलते घरवाले मृतक को चुपचाप अस्पताल या घर से श्मशान ले जाते हैं
  • श्मशान के रास्ते में श्मशान घाट तक शोक मनाने वालों का हुजूम नहीं दिखता है
  • कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन ने अवशेषों के निर्यात को भी प्रभावित किया है

नई दिल्ली । अंतिम संस्कार का क्रिया कर्म करने वाले डायोन पिंटो ने अपने 18 साल के करियर में कभी भी ऐसे किसी शख्स का अंतिम क्रियाकर्म नहीं किया है, जिसमें मृतक के परिवार के सदस्य नहीं हो। लेकिन बीते मंगलवार को डायोन पिंटो ने ऐसे ही एक 99 वर्षीय मृतक महिला के अंतिम संस्कार की क्रिया पूरी की, जिसके बच्चे विदेश में रहते है। कोरोना वायरस के चलते उड़ाने रद्द कर दी गई हैं, जिस वजह से मृतक महिला के बच्चे नहीं आ पाए। अंतिम संस्कार के वक्त उनके सिर्फ दो रिश्तेदार मौजूद थे।

घरवाले चुपचाप ले जाते हैं अस्पताल
कोरोना वायरस के चलते घरवाले मृतक को चुपचाप अस्पताल या घर से श्मशान ले जाते हैं। श्मशान के रास्ते में श्मशान घाट तक शोक मनाने वालों का हुजूम नहीं दिखता है। ‘सर्वपूजा’ करने वाले नितेश मेहता ने बताया कि पिछले एक हफ्ते में कम से कम 15 परिवारों के अनुरोध को उन्होंने पूरा किया है। मेहता कहते हैं, “मृतक के परिवार वालों ने मुझे अस्पताल से सीधे शव लाने की व्यवस्था करने के लिए कहा, क्योंकि वे शव को घर ले जाकर संक्रमण नहीं फैलाना चाहते थे।”। उन्होंने बताया कि वे लोग आखिरी मिनट में प्राइवेट एम्बुलेंस ड्राइवरों को किराए पर लेना चाहते थे क्योंकि कई लोग डर के बीच काम करने के लिए तैयार नहीं थे।

6 घंटे का समारोह 1 घंटे में
कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन ने अवशेषों के निर्यात को भी प्रभावित किया है। पिंटो बताते हैं, “उड़ानों के बंद होने के साथ, हमारी दैनिक बुकिंग आठ से घटकर लगभग पांच हो गई है,” उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार का समय की अब घट गया है। पहले करीब 6 घंटे तक चलने वाला समारोह में अब एक घंटे से भी कम समय लगता है।

कब्रिस्तान का हाल भी ऐसा ही
कुछ ऐसा ही हाल मुस्लिमों के होने वाले अंतिम संस्कार का है। शव को कब्रिस्तान में ले जाने से पहले मुस्लिम, अंतिम संस्कार के जुलूस को मस्जिद के बाहरी हिस्से रखकर नमाज पड़ता हैं। लेकिन मस्जिदों पर ताला लगा दिया गया है। इसलिए नमाज़ को घर पर ही पढ़ा जाना चाहिए। माहिम मुस्लिम कब्रिस्तान के प्रशासन अधिकारी शब्बर काबली ने कहा, “एक सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, मृतक के साथ कब्रिस्तान में 20 से अधिक लोगों को जाने की अनुमति नहीं है।”

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