2020 में भारत में हुआ दुनिया का सबसे बड़ा प्रदर्शन, किसान आंदोलन शामिल हुए थे करीब 25 करोड़ लोग

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इंडिया रिपोर्टर लाइव

नई दिल्ली 04 जुलाई 2024। राजनीतिक निर्णयों, अन्याय, असमानता, जलवायु परिवर्तन और अन्य कारणों से दुनिया भर में विरोध प्रदर्शनों की संख्या तीन गुना से अधिक हो गई है। जर्नल नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन में यह जानकारी देते हुए बताया गया है कि हिंसक प्रदर्शनों के मुकाबले अहिंसक और शांतिपूर्ण किए गए प्रदर्शन ज्यादा शक्तिशाली होते हैं और यह राजनीतिक सत्ता को बदलने में अधिक सक्षम होते हैं। इस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि 2006 और 2020 के बीच हुए आंदोलनों में भारतीय किसानों का विरोध प्रदर्शन दुनिया में सबसे बड़ा था, जिसमें करीब 25 करोड़ प्रदर्शनकारियों ने हिस्सा लिया था।  अन्य प्रमुख विरोध प्रदर्शनों में 2010 के अरब स्प्रिंग व ऑक्यूपाई आंदोलन और 2020 में वैश्विक ब्लैक लाइव्स मैटर प्रदर्शन शामिल हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि इजरायल-हमास संघर्ष के बाद से हजारों की संख्या में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। इसके अलावा नए कृषि नियमों को लेकर जर्मनी, बेल्जियम और भारत जैसे देशों में किसान विरोध प्रदर्शन भड़क उठे हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि पुलिस दमन से प्रदर्शनकारियों को अधिक समर्थन मिलता है। एक वैश्विक अध्ययन में कहा गया है कि असहमति या संस्थाओं में विश्वास की कमी के कारण भी विरोध प्रदर्शनों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है।

1900 से 2006 के बीच 300 विरोध प्रदर्शन
अध्ययनकर्ता पियरसन ने उल्लेख किया कि शोध से पता चलता है कि 1900 से 2006 के बीच क्रांतिकारी 300 विरोध प्रदर्शन राष्ट्रीय नेताओं को सत्ता से हटाने के उद्देश्य से किए गए थे। फिलीपींस की पीपुल्स पावर क्रांति जैसे अहिंसक विरोध प्रदर्शन 1986 में तानाशाह फर्डिनेंड मार्कोस को सत्ता से हटाने में सफल रहे। अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक एरिका चेनोवेथ का हवाला देते हुए, पियर्सन ने कहा कि हर वह आंदोलन सफल रहा जिसने आबादी के कम से कम 3.5 प्रतिशत लोगों को संगठित किया। इससे 3.5 प्रतिशत नियम के रूप में जाना जाने वाला नियम सामने आया कि विरोध प्रदर्शन में बदलाव सुनिश्चित करने के लिए इस स्तर की भागीदारी की आवश्यकता होती है। हालांकि यह आंकड़ा भ्रामक हो सकता है।

अहिंसक प्रदर्शनों की सफलता का कारण
पियरसन ने 2010 में टेक बैक पार्लियामेंट अभियान का उदाहरण दिया, जिसका उद्देश्य चुनावी सुधार था। इसने  मांगों को लेकर एकजुटता के कारण सफलता पाई थी। समन्वित नारों और मांगों के साथ एक संगठित जनसमूह ने 2011 में यू.के. के जनमत संग्रह को प्रभावित किया था। यह 2011 में ऑक्यूपाई लंदन से अलग था, जहां विरोध प्रदर्शनों में असमानता, वित्तीय विनियमन, जलवायु परिवर्तन और उत्पीड़न सहित कई मांगें शामिल थीं। बताया जाता है कि इनमें सामंजस्य की कमी थी। पियर्सन ने कहा कि अधिकारियों द्वारा दमन के साथ अहिंसक विरोध एक शक्तिशाली मिश्रण बन जाता है, क्योंकि इस तरह की कार्रवाइयों को अक्सर प्रदर्शनकारियों को मीडिया एक सहानुभूति के तौर पर कवरेज देता है। इसके विपरीत, हिंसक विरोधों को अक्सर मीडिया द्वारा दंगे और अव्यवस्था के रूप में लेबल किया जाता है।

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